वो तो अपने परिवार को ही भूल चुकी थी, केवल कुछ धुंधली यादों के सहारे परिवार से मिलने की उम्मीद लगाये बैठी थी। परिवार भी उसके मिलने की उम्मीद छोड़ चुका था, लेकिन शायद विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बाल कल्याण समिति, जयपुर (राजस्थान) और बिछुड़े हुए लापता व्यक्तियों को उनके परिवारों से मिलाने के प्रयासरत LOST FOUND PERSON अभियान उसके जीवन में देवदूत बनकर आये और दस वर्षों बाद जून, 2019 में उसे उसके परिवार से मिलवाया।
ट्रेन ले गई दूर, लेकिन विधाता को था कुछ और ही मंजूर
यह कहानी है उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के वभनान के पास एक छोटे से गांव में रहने वाली तेहरून नामक उस अबोध बच्ची की, जिसकी उम्र सन् 2009 मे महज 5 वर्ष थी और अपनी नादानी में एक दिन आंधी तूफान के मौसम में वो ट्रेन में चढ़ गई और अपने परिवार से दूर हो गई। परिवार ने भी उसे बहुत ढूंढा, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। किस्मत ने उसे जयपुर (राजस्थान) पहुँचा दिया और वह बालिका गृह में रहने लगी। इन दस वर्षों में अनेक बालिका गृहों में रहते हुए तेहरून अंततः राजकीय बालिका गृह, गांधीनगर, जयपुर में आवासित हुई। समय के साथ उसकी यादें भी धुंधली पड़ने लग गई। उसके परिवार की तलाश के लिए समय-समय पर प्रयास भी किये गये, लेकिन बच्ची की उम्र कम होने और उसे परिवार के बारे में कुछ ज्यादा याद नहीं होने के कारण सफलता नहीं मिल सकी।
तेहरून का परिवार तलाश करने के लिए बाल कल्याण समिति, जयपुर ने कमर कसी और LOST FOUND PERSON की जानकारी में यह मामला लाया गया। LOST FOUND PERSON के संस्थापक राहुल शर्मा द्वारा अनेकानेक बार तेहरून की काउंसिलिंग की गई और अनवरत प्रयासों के बाद अंततः उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में तेहरून का परिवार खोज निकाला गया।
फिर आई समस्या
तेहरून के परिवार से संपर्क हो जाने के बाद एक बार तो बाल कल्याण समिति और LOST FOUND PERSON ने राहत की सांस ली, लेकिन एक बार फिर एक नई समस्या उनका इन्तजार कर रही थी। लापता होते समय तेहरून मात्र 5 वर्ष की नन्ही बालिका थी और इन दस वर्षों में वह बड़ी हो गई थी, इसलिए तेहरून के परिवारजन मोबाइल से भेजी गई उसकी फोटो से उसे पहचान नहीं सकते थे। छोटे से गाँव का गरीब परिवार होने के कारण नासमझी में उन्होंने उस समय तेहरून के लापता होने की पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई थी। पाँच वर्ष की छोटी बच्ची होने और इस घटना को दस वर्ष बीत जाने के कारण तेहरून का कोई दस्तावेज भी उनके पास नहीं मिल पा रहा था। सन् 2009 में ग्रामीण क्षेत्रों में पुरानी रील वाली फोटोग्राफी का ही चलन होता था और तेहरून की ऐसी फोटोऐं भी इन 10 सालों में ना जाने कहां खो चुकी थी।
इन सब परिस्थितियों के चलते परिवार का सत्यापन करना बहुत टेढ़ी खीर हो गया, लेकिन बाल कल्याण समिति और LOST FOUND PERSON ने हिम्मत नहीं हारी। तेहरून के भाइयों को बार-बार प्रेरित करके उनके पुराने दस्तावेजों में से कहीं तेहरून की और उसके भाइयों की पुरानी फोटोऐं तलाश करवाई गई और उन फोटोज का मिलान तेहरून के पुराने रिकॉर्ड से किया गया तथा तेहरून से उन पुरानी फोटोज की पहचान करवाई गई, जिन्हें वह थोड़ा-थोड़ा पहचान पाई। अनेक बार तेहरून के भाई की तेहरून से फोन पर बात कराई गई, जिससे भाई-बहनों ने एक-दूसरे के साथ 10 सालों पुरानी बातें शेयर की, तो तेहरून की धुंधली पड़ी यादें भी कुछ ताजा होने लगी, जिससे परिवार का सत्यापन करने में मदद मिली।
इतना ही नहीं, सत्यापन की इस कोशिश में अंतिम ठोस सत्यापन का विकल्प खुला रखा गया। इन सभी कोशिशों के दौरान तेहरून की अपने परिवार से फोन पर बात तो करवाई गई, लेकिन कभी भी वीडियो कॉल नहीं करवाया गया। जिस दिन तेहरून को लेने के लिए उसका परिवार गोंडा (उत्तर प्रदेश) से जयपुर (राजस्थान) आने वाला था, उसकी पूर्व सूचना भी तेहरून को नहीं दी गई। अंततः, जब तेहरून का परिवार बालिका गृह के बाहरी कक्ष में बैठकर तेहरून का इंतजार कर रहा था, जब तेहरून को बिना कोई सूचना दिये उस कमरे में लाया गया और अचानक अपने परिवार को सामने देखकर तेहरून के मुँह से पहला वाक्य यही निकला - ‘‘ये तो मेरा भाई है रुस्तम।‘‘ इससे बड़ा सत्यापन कुछ हो ही नहीं सकता था। इसके बाद, तेहरून की अम्मी के बहते आंसुओं के बीच तेहरून का उसके परिवार के साथ गले लगकर हो रहे मिलन ने वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की आंखे नम कर दी।
इन दस वर्षों में तेहरून के पिता का भी निधन हो चुका था। पिता का निधन का यह समाचार भी तेहरून के कलेजे पर पत्थर बनकर गिरा। तेहरून और उसके परिवार द्वारा बार-बार बाल कल्याण समिति और स्व्ैज् थ्व्न्छक् च्म्त्ैव्छ का धन्यवाद दिया जा रहा था।
संस्थापक के शब्द
‘‘5 साल की छोटी सी उम्र में अपने परिवार से दूर हो चुकी तेहरून का परिवार लगभग 10 वर्ष बाद तलाशा जाना अत्यंत दुष्कर था, लेकिन पता नहीं क्यों, दिल से एक आवाज हमेशा आती थी कि तेहरून का परिवार जरूर मिलेगा, यह संभवतः ईश्वर का ही संकेत था। बाल कल्याण समिति, जयपुर (राजस्थान) की सदस्य श्रीमती निशा पारीक का LOST FOUND PERSON के प्रति अदम्य विश्वास और कोलकाता (पश्चिमी बंगाल) निवासी श्री श्रीगोपाल तापड़िया के मजबूत प्रण ने भी मुझे सदैव आशान्वित बनाये रखा। मैंने ना जाने कितनी बार बालिका गृह, जयपुर जाकर तेहरून की काउंसिलिंग की होगी, जिसमें सदैव वहां के अधिकारियों, कर्मचारियों व बाल कल्याण समिति का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ। मैं जब-जब भी तेहरून की काउंसिलिंग करता, तो हमेशा उसकी कातर निगाहें मुझसे यही सवाल पूछती कि ‘‘आप मेरा घर ढूंढ दोगे ना?‘‘
तेहरून का परिवार तलाश करने में हमें लगभग 8 माह लग गये, लेकिन जब एक रात लगभग 10 बजे मुझे कोलकाता से श्री श्रीगोपाल तापड़िया ने फोन पर बताया कि तेहरून का परिवार मिल गया है, तो मैंने उनसे तीन बार पूछा - ‘‘परिवार मिल गया? सच में मिल गया? पक्का मिल गया?‘‘ उसके बाद मेरे दिल में खुशी और उल्लास का जो अहसास हुआ, उसे तो केवल महसूस ही किया जा सकता है।
15 जून, 2019 को जब बालिका गृह, जयपुर (राजस्थान) में तेहरून अपने भाई और अम्मी से मिली और गले लगकर फूट-फूटकर रोई, उस दिन मिलन के उस क्षण को देखने वाला शायद ही ऐसा कोई इंसान रहा हो, जिसकी आंखें नम ना हुई हों।‘‘
--- राहुल शर्मा
आभार :
10 साल बाद हुए मिलन के इस नायाब पल में बाल कल्याण समिति, जयपुर (राजस्थान) एवं राजकीय बालिका गृह, गांधीनगर, जयपुर (राजस्थान) का विशेष सहयोग रहा। इस सफलता हेतु बाल कल्याण समिति, जयपुर (राजस्थान) के अध्यक्ष नरेन्द्र सिखवाल, सदस्य निशा पारीक, मीना यादव एवं आनन्द बिहारी पारीक, बालिका गृह, जयपुर की अधीक्षक पूजा व काउंसलर सीमा भार्गव के साथ-साथ कोलकाता (पश्चिमी बंगाल) निवासी श्रीगोपाल तापड़िया, नासिक (महाराष्ट्र) निवासी नीलेश, गोंडा (उत्तरप्रदेश) निवासी आदेश तिवारी व जयप्रकाश पाठक, गोंडा (उत्तर प्रदेश) में कार्यरत चाइल्ड लीगल प्रोबेशन ऑफिसर जे.पी. यादव, जयपुर (राजस्थान) निवासी नरेश सोनी सहित इस अभियान से जुड़े हुए समस्त देशव्यापी सहयोगियां का हार्दिक आभार और धन्यवाद।